यह पूरा इलाका पलायन और सूखे के लिए जाना जाता है। यहां रहने वाले भील समुदाय के आदिवासियों के लिए कई समस्याएं जैसे पानी की कमी और कम कृषि उपज बड़ा संकट हैं। पीने के पानी की समस्या तो इनमें सबसे ज्यादा विकराल है। फसलों को पानी देने का संकट भी अलग से है। इसके चलते वे साल में सिर्फ एक ही फसल से उत्पादन ले पाते हैं। इसी वजह से पलायन, मजदूरी, भुखमरी और शोषण का कुचक्र शुरू होता है।
इस समस्या का समाधान भी इन्हीं आदिवासियों की परंपरागत जीवनशैली और पारंपरिक ज्ञान में निहित है। इसे अब यह समुदाय पुनर्जीवित कर अभ्यास में ले आया है। इस काम में आदिवासियों की मददगार बना है वाग्धारा संस्थान। इसने ग्राम विकास के लिए और जनजातीय समुदाय में वर्षो से चली आ रही परंपरा जो लुप्त होने की कगार पर है, को जीवित रखने के लिए हलमा का महत्व समझाया। इसके बाद मियासा गांव के लोगो ने हलमा की परंपरा को फिर से शुरू कर दिया हैI
सामुदायिक भागीदारी वाले ‘हलमा’ की मदद से यहां कई जगह मेड़बंदी, फसल बुवाई, फसल कटाई और सामुदायिक भूमि पर अरंडी, खाकरा, टिमरू के बीज लगाकर पर्यावरण बचाने का काम भी किया जा रहा है। लेकिन इन दिनों मियासा गांव के यह आदिवासी हलमा द्वारा एक-दूसरे के खेतों में बुवाई, मेड़बंदी करके लाखों रुपये की बचत की वजह से चर्चा में हैं। यानी अनेक समस्याओं से जूझ रहे भील आदिवासियों के इस गांव ने कृषि और अन्य समस्याओं का समाधान अपनी ही परंपरा में खोज लिया है ।
हलमा भील समाज में मदद की एक परंपरा है। जब कोई व्यक्ति या परिवार खुद पर आए संकट से उबर नहीं पाता है, तब उसकी मदद के लिए सभी ग्रामीण जुटते हैं। उसकी मुश्किलों को कम करने के लिए सामूहिक प्रयास किया जाता है। इनकी सोच है कि सामूहिक प्रयासों से बड़ी से बड़ी समस्या का हल भी निकल सकता है। साथ ही यह भी कि किसी भी व्यक्ति को संकट में अकेले छोड़ देना मानवता के खिलाफ है।

भील समाज की हलमा एक प्राचीन परंपरा है। जब कोई व्यक्ति गांव में संकट में फँस जाता है और अपनी पूरी ताकत लगाने के बाद भी उस संकट से नहीं निकल पाता, तब वह हलमा का आह्वान करता है। गांव के लोग हलमा के जरिए सामाजिक दायित्व निभाकर उस व्यक्ति को संकट से निकालते हैं। हलमा की सबसे बड़ी खासियत है इसकी निस्वार्थ भावना और उदारता। इसमें संकट में फंसे व्यक्ति की सहायता तो की जाती है पर दोनों में से कोई पक्ष न तो अहसान जताता है, न ही मानता है। आपसी सहयोग और सहारे की यह आदिवासी परंपरा इसका उदाहरण है। गांव में खेतों पर काम करने के लिए मजदूर नहीं मिलतेI इस संकट से निपटने के लिए हलमा बुलाया जाता है।
हलमा परंपरा अब विलुप्त होती जा रही है। ग्रामीण क्षेत्र में कोई भी एक दूसरे का सहयोग करने को तैयार नहीं होते हैं। लेकिन यहां वाग्धारा के प्रयासों से मियासा गांव में इसी हलमा से सामुदायिक भागीदारी के तहत बिना एक भी पैसा खर्च किए तकरीबन 15 किसानों ने अपने खेतों में सामुदायिक तरीके से बुवाई की।
इस दौरान एक किसान के खेत में 25 लोग सहभागी बने I इस हिसाब से अलग अलग किसानों के खेतो में जा कर लगभग 300 किसानों ने एक-दूसरे के खेतों में श्रमदान कियाI हलमा द्वारा पैसा और समय भी बचाया गया हैI मियासा गांव के युवा, केशव निनामा मजदूरी के लिए गुजरात जाते थे। केशव और उनके पिता के पास बिना सिंचाई वाली तीन बीघा जमीन है जिससे वे केवल बारिश में बोई जाने वाली मक्का और तुवर ही उगा पाते थे। मक्का सिर्फ घर में खाने में काम आता है। उसे वे मंडी में नहीं बेच पाते थे और फसल से मुनाफा भी नहीं हो पाता था। इसके चलते घर में नकदी की हमेशा तंगी रहती थी।
सामुदायिक भागीदारी से अपनी यही वजह थी कि आधे परिवार को मजदूरी के लिए दूसरे प्रदेशों में जाना पड़ता थाI
इसके चलते खेती करने के लिए मजदूर नहीं मिलते थे और खेती में खर्चा भी बहुत होता था। पर अब खेती में फसल बुवाई और कटाई हलमा द्वारा करने से केशव का पलायन बंद हो गया है। इस प्रकार मियासा गांव में एक दूसरे की मदद करके अपनी की जरूरत का हल निकाल लिया है और हलमा के जरिये विकास की राह बना रहे हैं।
नागेन्द्र सिंह खंगारोत, वाग्धारा संस्था, संपर्क नंबर 98284 65903
(यह कहानी रणनीतिक संचार केन्द्र, विकास संवाद के सिविक आख्यान पहल के तहत तैयार की गई है। केन्द्र सामाजिक—नागरिक संस्थाओं के रणनीतिक संचार और स्टोरीटेलिंग पर क्षमतावृद्धि कार्यक्रम संचालित कर रहा है।)
