कहानियां

चौका प्रणाली ने बदल दी लोगों की तकदीर…

चौका प्रणाली ने लोगों के चेहरों से गुम हुई हंसी ओर मुस्कुराहट को वापस लौटाया है। जब यह गांव ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगा था, तब चौका ने इसे प्रेम की माला में संजोने जैसा कार्य किया है। इतना ही नहीं, लोगों को प्रकृति से जोड़ने की दिशा भी प्रदान की है। साथ ही, गांव के हर प्राणी को खुशी से जीवन जीने का आधार दिया है। गोचर को हरा-भरा करके पर्यावरण को संरक्षण और वन्य जीवों को सुरक्षा दी है। गांव में शांतिमय वातावरण बनने के साथ सब का विकास हुआ है आईये जानें, यह अद्भुत काम कैसे हुआ।

चौका प्रणाली ने बदल दी लोगों की तकदीर… Read More »

गोपालपुरा गांव के चारागाह की दास्तान

कभी-कभी कुछ कहानियां छोटी होती हैं, लेकिन वो कम शब्दों में भी अपनी पूरी दास्तां बया कर देती है। ऐसी ही एक छोटी कहानी राजस्थान के जयपुर जिले के पास खारे पानी की सांभरलेक के किनारे बसे गांव गोपालपुरा की है। इस गांव का गौचर बंजर हो चुका है और शेष गौचर निजी स्वार्थों के कारण अतिक्रमण की भेंट चढ़ गया।

गोपालपुरा गांव के चारागाह की दास्तान Read More »

हलमा से निकला समुदाय की समस्याओं का हल!

राजस्थान की अरावली पठार के बाँसवाड़ा जिले की तहसील घाटोल में बसा है पहाड़ी क्षेत्र वाला गांव मियासा। यहां रहने वाली जनजाति यहां की जैव-विविधता पर पूरी तरह निर्भर है। इसलिए यह जनजाति अपनी पुरातन परंपराओं और कुदरती ज्ञान को अपने अंदर समेटे हुए है। इसके चलते जंगल भी बचे हुए हैं और जनजाति समुदाय भी अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं।

हलमा से निकला समुदाय की समस्याओं का हल! Read More »

बंजर धरती ने यूं ओढ़ी हरियाली की चादर

राजस्थान के करौली जिले में चंबल नदी के किनारे बीहड़ में बसे गांव ओंड के छोटे और सीमांत किसान बारिश पर निर्भर थे। मिट्टी कटाव के कारण केवल 20% जमीन ही खेती लायक बची। लेकिन गांव वालों और सृजन संस्था के संयुक्त प्रयास से आज ओंद एक पुनर्जीवित गांव है।

बंजर धरती ने यूं ओढ़ी हरियाली की चादर Read More »

सूखे गांव जो पानीदार हो गए

महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र हमेशा से जलसंकट से घिरा रहा है। पानी फाउंडेशन द्वारा की गई पहल से इस अंचल के कई गांवों में पानी सहेजने को लेकर जागरूकता में वृद्धि हुई है और इसके सकारात्मक परिणाम सामने भी आने लगे हैं। अब वर्ष में 10 महीने इन गांवों में पानी उपलब्ध रहता है।

सूखे गांव जो पानीदार हो गए Read More »

खेती में देसी बीजों की वापसी

भारत के प्रत्येक कृषि अंचल में अपनी भौगोलिक एवं पर्यावरणीय परिस्थितियों की दृष्टिगत स्थानीय कृषि पद्धतियां और बीज विकसित किए हैं। झाबुआ स्थित संपर्क संस्था ने इन्हीं देसी बीजों के संरक्षण के लिए सामुदायिक बीज बैंक बनाया गया है।

खेती में देसी बीजों की वापसी Read More »

ऊंट, ऊंटपालक और आजीविका बचाने की पहल

रेगिस्तान में ऊंट की अनिवार्यता को कभी भी नकारा नहीं जा सकता। लेकिन बढ़ते मशीनीकरण से ऊंटों पर ही संकट दिखाई दे रहा है। ऐसे में राजस्थान में काम कर रही संस्था उरमूल की तकनीकी व नीति सलाहकार संस्था डिजर्ट रिसोर्स सेंटर की पहल काफी रोचक है।

ऊंट, ऊंटपालक और आजीविका बचाने की पहल Read More »

भड़ाज गांव बना हाईटेक खेती का रोल मॉडल

जब सूखे और पलायन के लिए कुख्यात भड़ाज गांव के लोग अखबार वालों के पास अपनी खबर छपवाने पहुंचे तो सशंकित पत्रकारों को विश्वास नहीं हुआ। कुछ दिन बाद पत्रकार आए, गांव और खेती देखी और ग्रामीणों से बात की। उन्हीं ने प्रमुखता के साथ पहले पन्ने पर यह खबर छापी। अपनी कर्मठता से यह गांव आज आसपास लोगों की चर्चा में है।

भड़ाज गांव बना हाईटेक खेती का रोल मॉडल Read More »

स्वच्छ रहें, स्वस्थ रहें

राजस्थान के बाड़मेर जिले के दूरस्थ गांव देदावास में प्रचलित अंधविश्वासों के कारण आज भी कई परिवारों के साथ स्वच्छता और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को लेकर काम करने की जरूरत है।

स्वच्छ रहें, स्वस्थ रहें Read More »

Scroll to Top