अखबार बोला पहले सबूत दो, फिर छापी पहले पन्ने पर खबर

भड़ाज गांव बना हाईटेक खेती का रोल मॉडल, सूने गांव में लौटी खुशहाली

जब सूखे और पलायन के लिए कुख्यात भड़ाज गांव के लोग अखबार वालों के पास अपनी खबर छपवाने पहुंचे तो सशंकित पत्रकारों को विश्वास नहीं हुआ। कुछ दिन बाद पत्रकार आए, गांव और खेती देखी और ग्रामीणों से बात की। उन्हीं ने प्रमुखता के साथ पहले पन्ने पर यह खबर छापी। अपनी कर्मठता से यह गांव आज आसपास लोगों की चर्चा में है।

भडाज गांव के लोग जब अखबार वालों के पास अपनी खबर छपवाने पहुंचे तो उन्ह यकीन ही नहीं हुआ। एक सूखे और पलायन वाले इलाके में हाईटेक खेती करने वाली बात पर वह यकीन ही नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने कहा कि हम आपके गांव में आकर सबूत देखेंगे तब ही आपकी खबर छापेंगे। गांव वालों ने कहा बिलकुल आईये। कुछ दिन बाद अखबार वाले आए भी। गांव देखा, लोगों से बात की। खेती में नई तकनीकों के प्रयोग को देखा और हैरान रह गए। जो पत्रकार पहले लोगों की बात पर यकीन नहीं कर पा रहे थे उन्हीं ने प्रमुखता के साथ पहले पन्ने पर यह खबर छापी। अपनी कर्मठता से यह गांव आज आसपास लोगों की चर्चा में है।

यह सच्ची कहानी है राजस्थान के अलवर जिले में थानागाजी ब्लॉक में से लगभग 12 किमी की दूरी पर बसे भडाज गांव की। यह इलाका अरावली पर्वतमाला की तलहटी में बसा है। गांव में 396 परिवार रहते हैं जिनमें गुर्जर, मीणा, ब्राह्मण, जांगिड व अनुसूचित जाति के लोग निवास करते हैं। गांव की कुल जनसंख्या 1678 है।  गांव में ज्यादातर लोग किसान हैं। जिनके पास जमीन नहीं है वे तो पहले से ही पलायन पर जाते थे, लेकिन पिछले पांच वर्षो से सिंचाई के लिए पानी की कमी से बाकि लोग भी पलायन की ओर जाने के लिए मजबूर हो गए थे। कम पानी से खेती में फसल उत्पादन कैसे करें? और परिवार को कैसे पालें?  यह सवाल वहां के लोगो को बहुत परेशान कर रहा था।

 भड़ाज गांव के लोग घर से बाहर मजदूरी के लिए जाने को मजबूर हो गए। घर को संभालना, पशुओं की देखरेख, खेती के छोटे-मोटे कार्य व सिंचाई (पानी चलाना) आदि कार्य करना महिलाओं की जिम्मेदारी बन गया। पहाड़ों के बीच गांव होने के कारण जंगली जानवरों का डर बहुत ज्यादा होता है। ऐसे में रात के समय महिलाओं को सिंचाई करने में बहुत परेशानी होती थी।

जब सामाजिक संस्था इब्तिदा इन समस्याओं से रूबरू हुई तो उसने इस गांव में पहल करने की ठानी। इस संस्था की स्थापना 18  नवम्बर 1997 को मेवात क्षेत्र में शिक्षा से वंचित बालिकाओं को तालीमशाला से जोड़ने से हुई थी। वर्तमान में यह संस्था महिला व बालिका सशक्तिकरण को लेकर काम कर रही है। संस्था इस इलाके में स्वयं सहायता समूह, महिला आजीविका संवर्धन, महिला अधिकार, महिला स्वास्थ्य, बालिका संदर्भ केंद्र, बालिका शिक्षा, वर्षा जल प्रबंधन आदि पर सक्रिय है।

वर्ष 2020 में महिला आजीविका संवर्धन कार्यक्रम के तहत इस गांव में आजीविका पाठशाला बनाई गयी। वहां पर हाईटेक कृषि व सूक्ष्म सिचाई पद्धतियों, उन्नत पशु प्रबंधन, महिला उद्यमी, बकरी पालन आदि के बारे में महिलाओ को प्रशिक्षण दिया। आजीविका पाठशाला के तहत लोगों को समझाया गया कि उन्नत कृषि व सूक्ष्म सिंचाई के उपयोग करने से कम पानी में सिंचाई की जा सकती है। साथ ही समय और मेहनत भी कम लगती है। 

शुरुआत में यह समझाना आसान नहीं था। गांव की महिला किसान भगवती ने कहा “ बूँद बूँद पाणी सु कोई फसल होवे छ काई बावला  बणावा ने लागरिया छो तो अन्य लोगों ने भी इस बात को कहा बूंद-बूंद पानी से फसल कैसे पैदा होगी?

संस्था के कार्यकर्ता भी इसे एक चुनौती के रूप में ले रहे थे। कोशिशों के बाद गांव की मूलीदेवी नाम की महिला किसान को प्रेरित किया। वह तैयार हुईं। उनके खेत में ड्रिप सिस्टम के साथ लो-टनल मलचिंग का एक मॉडल तैयार किया गया। इस पहल का बहुत अच्छा परिणाम सामने आया। जब लोगों ने खुद अपनी आंखों से यह मॉडल देखा तो उन्हें यकीन होने लगा कि बूंद-बूंद से भी खेती संभव है। इसके बाद लोगों को हाईटेक कृषि तकनीक से सिंचाई व उसके उत्पादन में हुए बढ़ोत्तरी के बारे विस्तार से बताया गया। उन्हें कम पानी व कम खर्चे से सब्जी और अन्य फसलों के उत्पादन का प्रशिक्षण दिया गया। धीरे धीरे यह मॉडल सफल होने लगा और गांव व ढाणियों में 192 किसानों ने लगभग 79 हेक्टेयर भूमि में इस प्रणाली को अपना लिया।

आज वहां कई सफल किसान हैं जा इस मॉडल से सफलापूर्वक खेती कर रहे हैं। राजन्ती ने इस प्रणाली को अपनाकर एक फसल में 2.5 लाख आमदनी की। उन्होंने ट्रेक्टर खरीद लिया। अन्य किसान इसका फायदा ले रहे हैं और 1 बीघा भूमि में 2-3 लाख तक कमाई कर रहे हैं।

 इब्तिदा संस्था में आजीविका कार्यक्रम के लीड और हाईटेक खेती को आगे बढ़ाने वाले डॉ. राजेश अग्रवाल कहते हैं कि “इब्तिदा द्वारा अलवर जिले के 6 ब्लॉक के 292 गांवों में महिला आजीविका संवर्धन कार्यक्रम चला रही है। हमारा सपना है कि कम पानी व उन्नत तरीकों से खेती, उन्नत पशु प्रबंधन, महिला उद्यमी, मुर्गीपालन जैसे अन्य कार्यो से महिलाओं की आजीविका बढ़े। यहां लोग लोटनल, मलचिंग, ड्रिप, लेजर, रेनगन, मचान, स्टैकिंग, नर्सरी आदि हाईटेक तकनीको को अपनाकर खेती कर रहे हैं और खेती को व्यवसाय के रूप में देख रहे हैं। 

आज भड़ाज गांव पूर्ण रूप से मॉडल हाईटेक बन गया है। सामान्य फसलों को छोड़कर वहां के लोग सब्जी व नगदी फसलो को अपनाने लग गए हैं। वहां के किसान अपनी सब्जियों को वह की लोकल मंडी एवं जयपुर, दिल्ली तक बेचते हैं। जो लोग पलायन पर जाते थे वो अब गांव में ही रहकर खेती कर रहे हैं। जो गांव कभी घरों में लोग नहीं रहने के कारण सूना-सूना सा लगता था आज वहां गली नुक्कड़ों पर लोग बैठकर चर्चाएं करते मिलते हैं।

 गांव के किसान कमलेश, भवानी, रामजीलाल, लोकेश, महेंद्र, भगवती, प्रेम देवी आदि गांव वालों का कहना है कि बूंद—बूंद सिंचाई से पैदा हुई सब्जियों को बाजार में अच्छा भाव मिलता है। अब तो ड्रिप आदि सिस्टम खरीदने के लिए शाहपुरा, जयपुर जाने की जरुरत नहीं है। लोकल बाजार में ही इसकी दुकानें खुल गई हैं।  इस गांव में जिनके पास भी जमीन है वो इन साधनों से ही सिंचाई कर फसल पैदा कर रहा है। 

भडाज गांव की आजीविका सखी राजन्ती देवी और महिला किसान उन लोगों को इसके लिए प्रेरित करते हैं। संस्था का लक्ष्य इस गांव को पूर्णत: रसायनरहित खेती की ओर ले जाना है। इसके लिए लोगों को पशुपालन व समन्वित कीट प्रबंधन के बारे में जानकारियां दी जा रही हैं। 

— खेमचन्द जोनवाल
इब्तिदा संस्था

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