जनवरी 2026

चौका प्रणाली ने बदल दी लोगों की तकदीर…

चौका प्रणाली ने लोगों के चेहरों से गुम हुई हंसी ओर मुस्कुराहट को वापस लौटाया है। जब यह गांव ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगा था, तब चौका ने इसे प्रेम की माला में संजोने जैसा कार्य किया है। इतना ही नहीं, लोगों को प्रकृति से जोड़ने की दिशा भी प्रदान की है। साथ ही, गांव के हर प्राणी को खुशी से जीवन जीने का आधार दिया है। गोचर को हरा-भरा करके पर्यावरण को संरक्षण और वन्य जीवों को सुरक्षा दी है। गांव में शांतिमय वातावरण बनने के साथ सब का विकास हुआ है आईये जानें, यह अद्भुत काम कैसे हुआ।

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गोपालपुरा गांव के चारागाह की दास्तान

कभी-कभी कुछ कहानियां छोटी होती हैं, लेकिन वो कम शब्दों में भी अपनी पूरी दास्तां बया कर देती है। ऐसी ही एक छोटी कहानी राजस्थान के जयपुर जिले के पास खारे पानी की सांभरलेक के किनारे बसे गांव गोपालपुरा की है। इस गांव का गौचर बंजर हो चुका है और शेष गौचर निजी स्वार्थों के कारण अतिक्रमण की भेंट चढ़ गया।

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हलमा से निकला समुदाय की समस्याओं का हल!

राजस्थान की अरावली पठार के बाँसवाड़ा जिले की तहसील घाटोल में बसा है पहाड़ी क्षेत्र वाला गांव मियासा। यहां रहने वाली जनजाति यहां की जैव-विविधता पर पूरी तरह निर्भर है। इसलिए यह जनजाति अपनी पुरातन परंपराओं और कुदरती ज्ञान को अपने अंदर समेटे हुए है। इसके चलते जंगल भी बचे हुए हैं और जनजाति समुदाय भी अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं।

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बंजर धरती ने यूं ओढ़ी हरियाली की चादर

राजस्थान के करौली जिले में चंबल नदी के किनारे बीहड़ में बसे गांव ओंड के छोटे और सीमांत किसान बारिश पर निर्भर थे। मिट्टी कटाव के कारण केवल 20% जमीन ही खेती लायक बची। लेकिन गांव वालों और सृजन संस्था के संयुक्त प्रयास से आज ओंद एक पुनर्जीवित गांव है।

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